तुम चाहती थी

 

तुम कहती थी ना

काश मुझे पहले मिले होते 

गिला मुझे इस बात का है 

जब मैं मिला रिश्तेदारी तोड़ दी 


तुम चाहती थी ना

मुझे तुमसे कोई बेहतर मिले 

खैर तुमसे बेहतर कोई नहीं 

लो मैंने वक़्तसे उम्मीद छोड़ दी 


तुम चाहती थी ना 

अब हम कभी नहीं मिलेंगे 

तुमने मुझे छोड़ दिया 

लो मैंने मेरी दुनियाही छोड़ दी 







एक नयी शुरुआत

मुद्दतों बाद किसी की फर्माइश आयी है 

लफ्जोंको फिरसे बुनने की घडी आयी है 


बातों-बातों में खो जानेकी ख्वाहिश जगी है 

वक़्त ने मानो यहीं ठिठकने की घडी आयी है


हर रात तेरी बातों में सूलझने लगी है 

कुछ रोज और, मुलाकात की घडी आयी है 


तु नहीं थी तो खुदसेही होती थी बातें 

हर सुबह शामके इंतजारकी घडी आयी हैं 


तुझसे मिलके लगा जैसे खुदसे ही मिला हूँ 

जालिम फासलोको मिटाने की घडी आयी है 






चर्चे

 


तेरे गुरुर से भी ज्यादा चर्चे मेरे हार के थे

एक पत्थरदिलसे ज्यादा चर्चे मेरे मिजाज के थे


घायल हो रहा था नफरत के लफ्ज़ बरस रहे थे

बहे नहीं कभी आंखोंसे चर्चे उन आसुओंके थे


दोस्ती मुकम्मल की ना ही कोई वादे निभाए 

तेरे बेवफाई से ज्यादा चर्चे मेरे परछाई के थे


सहारा दिया मयखाने ने तेरे इरादे कुछ और थे

नशाथा शराबमें लेकिन चर्चे हुस्न-ए-साकी के थे



ओल्या केसानिशी

अशीच ये समोरी ओल्या केसानिशी
मागितले काही तर म्हणू नको नाही

झाकला चेहरा कशाला या बटानी
तरीच चांदणे अजून पडलेच नाही

पहात रहावे आर्जव डोळ्यातले मी
मिठीत घेण्याचेही आज भान नाही

येतेस जवळ काळसुद्धा स्तब्ध होतो
शब्दांना बोलणे कसे ठाउक नाही

ओलेता स्पर्श जाणवतो ओठांना
जागेपणी कधी असे घडलेच नाही

आठवता तू नेहमी का हरवून जातो 
वेंधळ्या मना स्वप्नी मी पाठवत नाही










अनुभूती


रात्रीस भेदतो अनोळखा प्रकाश
मंद तेवणारी तु नंदादीपाची वात

किनारा सांगतो वेडावूनी आकाश
फेसाळणारी तू माझी बेफाम लाट

स्पर्श भासतो  कातावल्या मनास
सोबतीस जणू मोरपिसाची गाज

भेटी असंख्य तरी संपेना ही आस
राहतेस ओठांशी तू भैरवीची पहाट 


                                         

मरासिम

उन खुदसर यादोंको जाने क्यों मनाता हूं

कुछ देर छुप जाए कही हररोज मनाता हूं


कमीयों के बावजूद तुझे उतनाही चाहता हूं

ख़यालोमे तेरे होनेका जश्न हररोज मनाता हूं


गुलपोशी में गुमी तेरी मसर्रत ढूंढता हु

अज़ली रातकी सुबह हररोज मनाता हु


परेशान मरासिम को क्या नाम दु सोचता हूं

गुजरे रिश्ते का अहसास हररोज मनाता हु




आरजू

समंदर के रेतसे साहिल पे, घर बनाने की आरजू थी

बहकी बहकी लहरोंसे, मुझे दिल्लगी की आरजू थी |


बहता गया इस जिंदगी के साथ, या फिर बहाया गया

तुझसे मुलाकात के बाद, मुझे किनारे की आरजू थी |


बुझा न दे कही ये हवाएं, काँपती लौ को छुपा दिया

जला क्यों हाथ मेरा, मुझे कसूर जानने की आरजू थी |


मीर का मुद्दा इंतकाम था, कहे कोई तुम्हे तुमसा मिले

'अकाब' चाहे परवाह, मुझे उससे मिलने की आरजू थी |




आस

झूठा ही सही एक बार मुझे मर के देखना था

जनाज़े में कौन होता है शामिल ये देखना था


हरदम जो जताते थे है दिल बडा दरिया हमारा

क्या ऑंखसे उनके समंदर बहेगा ये देखना था


ताउम्र बोझ उठाये कइयोंका, कंधा कौन देगा

कौन दोस्त और कौन दुश्मन, बस ये देखना था


हमेभी आपसे मुहोब्बत है वो बोल न सके कभी

आज उनके चेहरेपे इजहार ए इश्क़ देखना था


पता नही जीतेजी हमे क्यों याद करता था कोई

किसके दिलसे आज मेरा जनाजा उठा देखना था






अच्छी बात

मेरी तरफ देख तेरा मुस्कुराना अच्छी बात नहीं

मरे हुए नादानको और मारना अच्छी बात नहीं


हिसाब रखता हूं मैं तेरे साथ बिताए हर पलका 

वक्तकी तिश्नगीको प्यासा रखे अच्छी बात नहीं


दराज-तर सफर बहुत कठिन है मगर तेरे सिवा 

बिना कोशिश अलविदा कहना अच्छी बात नहीं


हूँ वाकिफ तेरे रूह के रग रग से ऐ मेरे हमनवा

पर मैं तुम्हें अबभी अनजान हु अच्छी बात नही



अरे वेड्या मना तळमळशी



अधिकार देणारा मी कोण?
देवाने सर्वांनाच मन दिलंय
प्रत्येक फुलाला सुगंध असतोच
ती जिवनाला आधार देतायत

तू बोलणार तरी किती?
शब्द नि:शब्द होईपर्यंतच ना!
प्रत्येक हसऱ्या मुकेपणा मागे
शेवटी एक गोड होकारच ना!

तू नाकारणार तरी काय?
आपलं प्रेम हे एकमेव सत्य आहे
हवं ते माग मी देईन ,
दु:ख कुठे सुखापासून वेगळं आहे?

काही छेडण्याची जरुरीच नाही,
हृदयाच्या तारानाच मी हात घातलाय
नाही म्हटलं तरी हा झंकार
तुझ्या रोमारोमात भरलाय

सुख दु:ख,
चंद्र तारे,
काही मनोरे,
काही कंगोरे,
काहीही आण
चालेल,
कारण ते मोठ्ठ स्वप्न,
फक्त दोघांच असेल.