भावनांचा फुलोरा शब्दांचा धुमारा, काळाच्या गर्दीत मनाचा पसारा. जपताना त्या आठवणी, चार ओळी तुझ्यासाठी !
ओल्या केसानिशी
आरजू
समंदर के रेतसे साहिल पे, घर बनाने की आरजू थी
बहकी बहकी लहरोंसे, मुझे दिल्लगी की आरजू थी |
बहता गया इस जिंदगी के साथ, या फिर बहाया गया
तुझसे मुलाकात के बाद, मुझे किनारे की आरजू थी |
बुझा न दे कही ये हवाएं, काँपती लौ को छुपा दिया
जला क्यों हाथ मेरा, मुझे कसूर जानने की आरजू थी |
मीर का मुद्दा इंतकाम था, कहे कोई तुम्हे तुमसा मिले
'अकाब' चाहे परवाह, मुझे उससे मिलने की आरजू थी |
सुधाकर
सर्व काही असून सुद्धा
तुजविन चित्र अपूर्ण आहे
सर्व काही नसूनही तू
असशील तर संपूर्ण आहे
जागेपणी तुझे आभास
कल्पना स्वप्न नोहे
खोट्याविना खऱ्याची
किंमत अपूर्ण आहे
हिंदोळ्यावर हुंदके
छाती दडपली आहे
लटक्या भांडणाविना
संवाद अपूर्ण आहे
गुंतवशील कसे मला
शब्द शब्द मूक आहे
मिठीशिवाय माझ्या
तुझा राग अपुर्ण आहे
रात्र पहाटेला मिळे
सुधाकर मावळूदे
भेट तुझी नी माझी
अथवा अपूर्ण आहे
निघतेस मात्र जेव्हा
थांबवु तुला कसे
वेळ विचित्र आहे
काळ अपूर्ण आहे
रुबाई
गझल लिखू, पर समा बया कर नही सकता
तेरे बारेमे सोच सकु, पर तुझे पा नही सकता
ढूंढता हु नजदीक तेरे, न होने की वजह
इजहार ऐ इश्क़ मगर, कर नही सकता
मलमली अहसास ही काफी है, पास होनेका
मजा नही बिन तेरे, बारिश में भीग नही सकता
शुक्रगुजार हूं जिंदगी ने कभी तुझसे मिलाया
एतराज़ है, मक़रूज़ हु, कर्ज चुका नही सकता
तू मेरी रुबाई है, सिवा तेरे न-मुकम्मल जीना
चाहना चाहता हु, मगर तुझे खो नही सकता
Hamnashini
खुदगर्ज़
उम्मीद पुख्ता हो तो तस्वीर बने शानदार
घुलने के बाद अक्सर, ये रंग बदल जाते है ।
लगाए कश्ति एक माहिर माझी साहिल पार
हौसले बुलंद रखो, ये मौसम बदल जाते है ।
मासूम बेरहम वक्तसे बड़ा न कोई जादूगर
तुम मेरा दिल परखो, ये चेहरे बदल जाते है ।
कामसे काम रखते है, परवाह उम्मीद न कर
समयकी बात है प्यारे, ये लोग बदल जाते है ।
खुदगर्ज दुनिया खिंची आये रुपिया देखकर
जब हालात बिगड़े, तो ये रिश्ते बदल जाते है ।
जिस्म मुजस्सिम, बस तौसीफ है हमसफर
मिट्टी में मिलने के बाद ये मुर्दे बदल जाते है ।
इश्के दी चाशनी
कभी कभी मुझे तुम जलेबी की तरह लगती हो
चाश्नी में डूबी हुई सी, जब मुझसे बाते करती हो
हम मरकज़ चक्कर काटती हुई मेरे इर्द गिर्द (concentric)
मरोडनेपे जिसको, दिल से मानो प्यार बहता हो
तुम काजुकतली होने की संभावना ज्यादा है
वही एक है जो तुमसे सादगी सीखी है
उसकी दुनिया चाहे कितनीही गोलमटोल हो
लेकिन मेरे लिए त्रिकोनी हिरे जैसी है
खीर होती है थोड़ी पतली थोड़ी गाढ़ी
ठीक वैसेही मिजाज जब तुम मुझे डाटती हो
मैं बस देखता हूं तेरी आँखोंको और सोचता हूं
केसर की तरह घुल जाऊ इस फिरनी में
बहुत कम देखा है तुम्हे शरमाते हुए
जब भी शरमाती हो, हाथोंसे चेहरा छुपाके
जैसे गुजिया के अंदर गुड़ का हो पूरण
और मेरे लब्ज घी का काम करते रहे ।
कभी मेरे लिए हो सोनपापड़ी
तो कभी हो रंगबिरंगी बर्फी
या कहु रसभरी रसमलाई
या कहु मीठी ठंडी रबड़ी
नाम कई है तेरे दुनिया के लिए
मेरे लिए हो बस .....
इश्के दी चाशनी ।
मिलीभगत
हर रोज सुबह
मुझे बिना पुछे
वो सुरज की किरने
तुम्हे कैसे लिपट जाती है?
और गौरतलब है
तुम क्या खिल जाती हो।
कुछ उसी तरह
नहाने के बाद
वो पानी की बुंदे
तुम्हे नही छोडती
खैर कोई बात नही
गिले बाल मेरी कमजोरी है।
हवाओंको तो बस
चाहीये होता है बहाना
तुम्हारे साथ रहे
और करे मस्तीया
शायद वही तुम्हारी
हसी खिलाई रहती है
तुम्हे बिलकुल पता नही
रात की चादर ओढे
जब सो जाती हो
उस मासुम चेहरेके
भाव निहारने के लिये
मै रातभर जागता हू ।
और पता नही
इस सृष्टीके कितने
अनजान अनगिनत
तत्व तुम्हे आजभी
तराशे जा रहे है
शायद तुमसे अभी तक
खुदाका मन भरा नही।
और कुछ?
ऊन जखमोंको भरने केलीये
तुम्हारा एक आसू काफी है
पर हमने तो तुम्हे रोते देखा नही
क्या अबभी कूछ सितम बाकी है?
इस इंतजार के आईनेमे
तुम्हारा एक दीदार काफी है
पर हमतो बस राह देखते रह गये
क्या आज रात अमावसकी है?
इस रुखी रुखी जिंदगी मे
आप हमे याद करना ही काफी है
पर हम करते है इश्क बेइतहा तुमसे
क्या धडकने किसीं के लिये रूकी है?
खामोशी
खामोशी
खामोशी कितनी अजीब है !
खामोश होते हुए भी ,
बहुत कुछ कहती है ,
और फिर भी ,
कुछ नहीं कह पाती।
और देखो उस आहट को ,
छोटीसी जान ,
मगर एक हल्कीसी आहट ,
भावनाओंसे भरी ,
कई किताबें लिख देती है !
और उस आहट के बाद ,
खामोशिसे भरे अनगिनत पल ,
सबूत होते है ,
उन तमाम जज्बातोंके ,
जो कभी जन्मे ही नहीं।
फिर शुरू होता है ,
क़यासोंका ' सिलसिला ',
अगर ऐसा होता ,
तो कैसा होता ?
तुम ये कहती !
तुम वो कहती !
तुम इस बात पे हैरान होती !
तुम उस बात पे कितनी हसती !
......
.....
.....
......
मै और मेरी तन्हाई अक्सर ये बाते करते है !
( आखिरी लाइने जावेद अख्तर साहब के वही मशहूर गाने से ली है, उनकी क्षमा मांगकर | मकसद कविता को एक रोमांचक मोड़ पे ख़तम करना था | )
बाते
काश मै तुम्हारा मन पढ पाता
साथमे बैठके उससे,
कुछ बाते कर पाता,
पुछता उससे वो अनगिनत राझ
जो तुम्हारी आंखे ,
कभी बताने वाली नही |
उतर जाता इन
गहरी भूरी आंखोमे
ढूंढते इस नमी का कारण।
पहुंच जाता दिल के उस कोनेमे
जहा कुछ गिलापन है मौजूद
मुझे यकीं है, है मेरे लिए |
जान जाता मुस्कुराहाट के पिछे छुपी
आहटोंके बारेमे।
जो किसिने सुनी नही
या उसने सिर्फ सीखा है,
दुसरोंके दर्द बटोरना ?
आईने के सामने जब खडी होती हो,
पता कर लेता उन ख्यालोंको,
और हलके से सवाल करता,
क्या मैं भी शामिल हू उसमे ?
घुम आता उसके साथ ,
वो तमाम गलीया,
लग रही है जो अंधेरेसे भरी,
खोज लेता चंद यादगार लमहें,
जो गलतीसे इनमे गुम हुऐ है |
सूनके वो सारी बाते,
जो कभी किसिने नही सुनी,
बोझ हलका कर देता तब,
जब मै तुम्हारा मन पढ पाता।
साथमे बैठके उससे,
कुछ बाते कर पाता |
गुफ़्तुगू (Conversation)
गुफ़्तुगू (Conversation)
न आपने पूछा,
न हमने कहा |
बाते तो ख़ूब हुई,
अहम एक भी नहीं |
अपनापन था ,
और थी कशिश | (Attraction),
बाते तो ख़ूब हुई,
इंतिशिर कोई नहीं | (Anxiety, rush)
फ़िक्र है भी ,
और नहीं भी |
समझ दो तरफा थी ,
मख़लूत कुछ भी नहीं | (Confusion)
न आपने जाना ,
न हमने जताया |
बाते तो ख़ूब हुई,
इज़हार फिर भी नहीं |
दुरावा
दुरावा
या तरुतळी
एकलीच मी
हात दे सख्या रे
घायाळ मी हरिणी
पाहते वाट तुझी
आज तरी येशील तू
अवस्था गूढ माझी
कान शीळ देशील तुविरले आभाळ सारे
भिजवुनी सरला दिवस
पाय घरला परतले
रात्र पुन्हा एक अमावास
मोजीत तारे
रात्र चालली
चंद्राच्या प्रकाशात
रातराणी फुलली
नाही मला काय त्याचे
डोळ्यांनी रात जागली
आयुष्य असे क्षणभंगुर
लावु दे भैरवीचा सुर
मिटवून टाक अंतरे
आज तरी ये बरे!
येशील स्वप्नात तू
इतुके मज ठाव आहे.
अभागी नशीब आहे
डोळ्यात मात्र जाग आहे.
मै शायर तो नहीं , मगर...
मै शायर तो नहीं , मगर...
दुरावा
दुरावा
त्या रात्री जी हरवलीस तू ,
तिलाच शोधतो आहे.
मिठीत विसावली होतीस तू,
ती मिठी भोगतो आहे !
मंद धुंद क्षण, जे दुरावले,
पुन्हा ते शोधतो आहे.
विश्वास पूर्ण आहे तुजवरी,
परीस्थिती भोगतो आहे !
आहे नक्की, परतशील तू ,
तो क्षण मी शोधतो आहे.
असेल वाईट तरीही, उद्यासाठी
हा विरह भोगतो आहे !
देईल आधार जिवनाला,
ती सखी शोधतो आहे.
जगात आहे कुणीतरी माझे,
हा आनंद भोगतो आहे !
इच्छा
माझी कविता तशी गुणगुणण्यासारखी !
आज तुला का म्हणायचीय ?
शब्दांमधल्या दडलेल्या अर्थाला ,
का वेगळाच सुर लावायचाय ?
पण अर्थहीन उधळले नाही ,
शब्द जपुन वापरलेत मी
त्याची किंमत मोजतोय अशी !
ऐकायला मी नसणारे ,
हे गीत गाणारेस कुणासाठी ?
दोघं बसले असताना ,
एकांतात दूरच्या तळ्याकाठी !
गाण्याची सवय लावु नकोस ,
एकांतात कदाचित मी आठवेन ,
अंगा अंगाला होणाऱ्या स्पर्शात ,
फक्त मी आणि मीच असेन !
सर्व काही विसरून जा ,
माझे नवे गित घेऊन जा ,
आनंदाने जगण्यासाठी ,
ही एकतरी भेट ठेवुन जा!
स्वप्न
स्वप्न
अवधी
अवधी
का लिहितेस माझे नाव वाळुमधे,
पुसुन टाकतील लगेच त्या लाटा,
झिजण्यास तपांचा वेळ हवा !
का ठेवतेस फुल सांभाळुन,
उदया नसेल सुगंध त्याचा,
लाव एक वेल रातराणीची,
प्रत्येक रात्रीस सुगंध माझा !
का बघतेस रंगधनु कडे,
विरतील हवेत रंग त्याचे,
भरून घे रंग प्रेमाचे,
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