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आरजू

समंदर के रेतसे साहिल पे, घर बनाने की आरजू थी

बहकी बहकी लहरोंसे, मुझे दिल्लगी की आरजू थी |


बहता गया इस जिंदगी के साथ, या फिर बहाया गया

तुझसे मुलाकात के बाद, मुझे किनारे की आरजू थी |


बुझा न दे कही ये हवाएं, काँपती लौ को छुपा दिया

जला क्यों हाथ मेरा, मुझे कसूर जानने की आरजू थी |


मीर का मुद्दा इंतकाम था, कहे कोई तुम्हे तुमसा मिले

'अकाब' चाहे परवाह, मुझे उससे मिलने की आरजू थी |




घड़ी

मेरे दिलकी दुआ आज कौनसा रंग लायी है

दहलीज पार कर आज गझल घर आयी है | 


शमा बुझाओ, उसे जलने की जरुरत नहीं है 

रोशनीसे महकाने, आज नजम घर आयी है | 


अनगिनत तसव्वुर ख़यालोमे बेझिझक है

तू सामने है, तो दिमागने सोच क्यों खोयी है?


कुछ बाते करू या बस ये नूर देखता रहु मैं 

तेरे लबोने इन लब्जोंको ख़ामोशी सिखायी है | 


निगाह मिलाना चाहता हु, आँखे क्यों झुकी है 

चाँद ढकने कम्बख्त, अकेली झुल्फ आयी है !


रफ़्तार बहके इसकी, समय बड़ा बेईमान है 

ठहर थोड़ा, इश्क़के इम्तिहांकी घड़ी आयी है | 


अपने दरमियाँ के ये फासले ख़त्म क्यों नहीं होते 

मजबूर हालात तोड़ने ये मुनासिब घडी आयी है | 


बहकने दे 'अकाब' मुझे रोकना नामुमकिन है 

इन सवालोंसे, जवाब माँगने की बारी आयी है | 

                                                         





वक्त तो लगता है ....


रात बरसात की थी, और आँखे कुछ नम

भीगा चिराग जलने में, वक्त तो लगता है


उनको अपना बनाना, बात ये मुश्किल है

इक पत्थर घर बनने में, वक्त तो लगता है


बात जिनके दिल छू जाती, वही अपने है

आँख से आँसू बहने में, वक्त तो लगता है


लाख सौदे रोज होते है, इस दुनिया मे

सच्चा प्यार समझने में, वक़्त तो लगता है


इनकार का गम नही, तेरी मजबूरी का है

बेबस हालात समझने मे, वक्त तो लगता है


इस भीड़ में तनहा 'अकाब ' है तेरे बिना

खोने का डर मिटने मे, वक्त तो लगता है

                                                 

राही

अपना समझा, असल में पराये है

मेरे आँखोंके सपने, अब पराये है


तेरे इश्क़ से, हमे बेहद रश्क है

तेरे गली के रास्ते, अब पराये है


तमीज़ मेरे प्यार का अंदाज़ है

दुनिया के तरिके, हमे पराये है


हमसफर कम, अजनबी ज्यादा है

तेरा जहाँ,  मेरा आलम, पराये है


हम हिस्सा थे अतीत का, याद रहे

वक्त की बात है, राही भी पराये है


तेरी यादें तेरी बाते, अब भी जवा है

सिर्फ वो कुर्बत लम्हे, अब पराये है


शहर में हर कोई, अजनबीसा है

लुटे लुटाये हम, खुदसे पराये है


लब्ज ढूंढ रहा, बदनसीब 'अकाब' है

उफुक़ के लिए, सारे समन्दर पराये है


Hamnashini



रुक जाता था हर बार,
एक मुलाकात के लिये
और वो मुडके देखे नही कभी !

थम जाता था हर बार,
उनका चेहरा देखने
और वो पर्दा उठाये नही कभी !

इरादा था मैं डुब जाऊ,
चाह-ए-जकन में तेरी
देख हमेवो मुस्कुराए नही कभी !

तरस रहा मुद्दत से,
कुछ तो कहिये हमसे
और वो लब खोले नही कभी  !

चाहता था छू लू उन्हें,
बजे दिलमे अबरेशम
कमबख्त मौका मिला नही कभी !

हो अगर पत्थर दिल तुम,
तो संग तराश हम भी है
और जिद हम छोड़े नही कभी !

जिसम की बात न थी,
मैं ढूंढ हमनशिनी रहा
और दुआ कबुल हुई नही कभी !




 

आहिस्ता

फूल नही रुत ए बहार लायी थी जिंदगी में

छोड़कर मुझे जाना है, जाइये आहिस्ता आहिस्ता ।


उम्र बित जाती है जहनको समझने में

आगाज़ ही उलझने बढा रहा है , आहिस्ता आहिस्ता ।


क्यो तुझसे दिलकशी, अनजान हु मैं

इंतज़ार अब जहर बन रहा है, आहिस्ता आहिस्ता ।


खुदा है करामाती, देर क्यों नतीजेमे

वक्त उम्मीद कोताह कर रहा है, आहिस्ता आहिस्ता ।


क्यो जवान यादोँसे रुक्सत करू तुम्हे

मुकाबला मौत जीतेगी तय है, पर आहिस्ता आहिस्ता ।

‌

आश्ना


रात घनी, और शजर जुगनू भरा

तले उसके प्यार हमारा बाहों भरा। 


अहसास बने जेर-ए-लब सासोंका

तेरे होठोंका प्याला, मदहोशी भरा। 


सवारू चनबेली के फूल से लदा जुड़ा

साँसोमे भरलू महक, जिस्म खुशबू भरा। 


थामलु चेहरा हाथमे, फिर चुमलू माथा

एक वादा करलू आंखोसे, ऐतबार भरा। 


पलकोमे अश्क खूब सजा कर रखना 

जुदाई का हर लम्हा, तेरा तसव्वुर भरा। 


उजाला कर रहा रात को अलविदा

न जा, मेरा दिल तो अबभी नही भरा। 

                                                     ‌

अक्स

 

देखते रहे , जब देखती हो आईना

सुना तेरे हुस्न के चर्चे, हर गली है। 


कौन खूबसूरत, तुम या अक्स जानुना

बहस कर रहा आशिक, हर गली है। 


जानलो, पूरा सच नही कहता आईना

बला की हसिन तुम हो, सुने हर गली है। 


अक्स का हकदार बन बैठा है आईना

हुस्न चोरी की फिराक में, कोई हर गली है। 


बेनकाब न निकलो बात मेरी ये मानना

बेवजह जान जाती, हर रोज, हर गली है। 


छत पर खड़े होकर बाल खुले न छोडना

चाँद देख ईद मनाने, तैयार हर गली है। 




फिक्र


सुबह सुबह 

घरके पीछे बग़ीचेमे 

थोई देर ही सही 

टहल लेता हु। 

कभी पानी देने के लिए ,

तो कभी बिनावजह। 


फिर ये ख्याल आता है

इन पेडोने कल ठंडभरी रात 

अकेले कैसे गुजारी होगी ?

जब मैं  कम्बल ओढ़े ,

इस सर्द मौसम में बाहर कैसे निकलू?

ये सोचते मन बना रहा था ,

तो कही ये मेरे इंतज़ार में 

डुबे तो नहीं थे न ?


जब तक हवा नहीं चलती 

सब आराम से सोते रहते है। 

धुप आनेतक ओस की बून्दोंसे 

नहाभी  लेते है 

और मै  हु उनका बावर्ची 

जो सुबह ब्रेकफास्ट लेके 

पहुंच जाता हु 

और सुनता हु उनकी शिकायते। 

शिकायत वही पुरानी 

ये हर रोज  आता नहीं। 


कुछ टहनिया लिपट भी जाती है 

मुझे फिर उनको हलके हातोंसे 

छुड़वाना पड़ता है 

अगर काटे हो तो 

थोड़े ज्यादाही सावधानी से 

लेकिन मै उनपर गुस्सा नहीं होता 

मुझे पता है ,

कसूरवार मै  ही हु। 


उन सूखे पत्तोंको वही ,

जमीपे छोड़ देता हु। 

जहा से जन्मे,

वही दफ़न हो 

और अगला जनम 

मेरे आँगन में हो। 


फ़ूलोंको छूता तक नहीं 

हम आखिर इंसान है 

और ये हात पाक बिलकुल नहीं 

लाख समझाने पर भी 

वो हमारा पीछा नहीं छोड़ते 

उनकी महक जब हमें 

छू के जाती है ,

कसमसे, यादें महका देती  है। 

अफ़सोस जताते है उनसे 

तुम तितलियोंके लिए बने हो ,

बालोंके जुड़े की 

उम्मीद मत रखना। 


सुखी टहनियोमे मुझे 

मेरा बुढ़ापा दिखाई देता है। 

फिर उन सूखे पेड़ोंको भी 

डालता हु पानी 

सोचकर कही कोई एक शाख ,

बाहर  निकलने की

फिराकमे न बैठी हो। 


चंद समय में मेरी जिम्मेदारी 

मानो ख़त्म होती है। 

एक बाप की तरह 

कर देता हु हवाले ,

उन जवान किरणोंके हाथ 

मन तो नहीं करता... 

पर पता होता है 

छाव में तो बचपन खिलता है 

धुप बनाती है -सवारती  है जिंदगी। 

अगले नस्ल को ,

एक नयी रूह देने के लिए। 


अगली सुबह फिर ,

यही सोचके ,

बगीचे में टहल आता हु ,

कही ये पेड़, फूल, पत्ते, 

मेरा इंतज़ार तो 

नहीं कर रहे थे न?



रोका न करो !


हर बात पर यकीन है, फिर भी

वादे थोड़े करो, पर निभाया करो


तुझे हम दिलके करीब रखे है

झूठा ही सही प्यार तो करो


चुप है, कारण तुमसे रुठ गए है

पर तुम बात हमसे किया करो !


तेरा चेहरा आंखोसे हटता नही

फिर भी तुम ख़्वाबोमे आया करो !


ये आंखे आज क्यो इतनी नम है

मेरे दिले गम से नाज़िर तो करो !


घर का आईना तेरा आशिक है

फुरसत से उसे अलविदा करो !


तेरे जिंदगी से दूर जाना चाहते है

पर तुम हमे कभी याद किया करो !


तेरा हात नही ले सकता हाथोंमें 

नजर मिलाने से मुझे रोका न करो !


किस्मत से मीटभी जाये फासले 

खुदा अगर है कही, उसे रोका न करो !




तुम हो कौन?

 

मेरा घर आज मुझसे पूछा, तुम हो कौन?

दिनके उजालेमे अर्सो बाद देखा, तुम हो कौन?


देर रात से आते, सुबह जल्दी निकल जाते हो,

चाँद तो नहीं, और नहीं शबीना, तुम हो कौन?         (निशाचर)


खोकली दिवारोंके रंग अब उड़ गए है 

दरवाज़े को ताला लगानेवाले, तुम हो कौन?


बगिया उजड़के कितने बरस बित  गए 

बहारकी तमन्ना रखनेवाले, तुम हो कौन?


इंतज़ार और सूनापन मालिक बन बैठे है 

वक़्त किराया है, पैसे फेंकनेवाले तुम हो कौन?


इंसान ही नहीं, कभी घर भी मरा करते है ,

पराये ख्वाबोंका क़त्ल करनेवाले, तुम हो कौन?



उड़ान

 

ये साकित आसमा, बे-हद है

उड़ान तेरे मनका दायरा है।  


चढ़ते सूरज से रुबरु करले ,

कामयाबी तेरी परछाई है  | 


उम्मीद के पर मजबूत तू कर ,

शहर की हवा थोड़ी खराब है | 


तू अक़ाब है , उंचाइसे न डर 

याद रहे, आखरी पड़ाव जमी है !

                                         




इश्क़ का नशा !


ऐ साकी, तू शराब पिला, दवा नही

ये इश्क़ है, बस एक रात का नशा नही।


गैर जिम्मे दाराना तेरी फितरत नही

ये इश्क़ है,  हमे बेदर्दीसे तोहमत नही ।


तू नही, तेरे बगैर ये राते रूमानी नही

ये इश्क़ है, खुदाकी कोई आरजू नही ।


सब कुछ तेरा, ये  दिल भी अब मेरा नही

ये इश्क़ है, एक खरीद ओ फरोक्त नही।


फैसले यही होंगे, हालात का इलाज नही

ये इश्क़ है, सुनाहै जन्नत में क़ाज़ी नही ।


जमाना खराब है, उससे कोई उम्मीद नही

ये इश्क़ है, तेरी रजामंदी जरूरी नही ।


                                                        

गुफ़्तुगू (Conversation)


 गुफ़्तुगू  (Conversation)


न आपने पूछा,

न हमने कहा |

बाते तो ख़ूब हुई,

अहम एक भी नहीं | 


अपनापन था ,

और थी  कशिश | (Attraction),

बाते तो ख़ूब हुई,

इंतिशिर कोई  नहीं | (Anxiety, rush)


फ़िक्र है भी ,

और नहीं  भी |

समझ दो तरफा थी ,

मख़लूत कुछ भी नहीं | (Confusion)


न आपने जाना ,

न हमने जताया |

बाते तो ख़ूब हुई,

इज़हार फिर भी नहीं | 




दुरावा



दुरावा 


या तरुतळी
एकलीच मी
हात दे सख्या रे
घायाळ मी हरिणी

पाहते वाट तुझी
आज तरी येशील तू
अवस्था गूढ माझी
कान शीळ देशील तु

विरले आभाळ सारे
भिजवुनी सरला दिवस
पाय घरला परतले
रात्र पुन्हा एक अमावास

मोजीत तारे
रात्र चालली
चंद्राच्या प्रकाशात
रातराणी फुलली
नाही मला काय त्याचे
डोळ्यांनी रात जागली

आयुष्य असे क्षणभंगुर
लावु दे भैरवीचा सुर
मिटवून टाक अंतरे
आज तरी ये बरे!

येशील स्वप्नात तू
इतुके मज ठाव आहे.
अभागी नशीब आहे
डोळ्यात मात्र जाग आहे.






दुरावा



दुरावा


त्या रात्री जी हरवलीस तू ,
तिलाच शोधतो आहे.
मिठीत विसावली होतीस तू,
ती मिठी भोगतो आहे !


मंद धुंद क्षण, जे दुरावले,
पुन्हा ते शोधतो आहे.
विश्वास पूर्ण आहे तुजवरी,
परीस्थिती भोगतो आहे !


आहे नक्की, परतशील तू ,
तो क्षण मी शोधतो आहे.
असेल वाईट तरीही, उद्यासाठी
हा विरह भोगतो आहे !


देईल आधार जिवनाला,
ती सखी शोधतो आहे.
जगात आहे कुणीतरी माझे,
हा आनंद भोगतो आहे !


Some of my facebook status update (Poems)




Some of my facebook status update (Poems)






" I'VE watched you now a full half-hour,

Self-poised upon that yellow flower;

And, little Butterfly! indeed

I know not if you sleep or feed.

How motionless!---not frozen seas More motionless!

and then What joy awaits you,

when the breeze Hath found you out among the trees,

And calls you forth again !"

                                                                                             ---- William Wordsworth

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कैफियत


कैफियत 


साक्षीदार मी, आरोपीही मी, कुणासाठी भांडु !

कैफियत माझी कोणत्या अदालतीत मांडु? 



स्पर्धी मी, प्रतिस्पर्धीही मीच, कसा डाव खेळू !

डाव मोडवत नाही, नवा डाव कसा मांडु?



तुझ्या बाजूने मी, माझ्या बाजूने फक्त मी, !

कळत नाही आज, कुणाची बाजू कशी मांडु?

                                                 


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भेट



This time some watercolor effect. Its subtle, see photo in full screen mode. Matching theme poem was written 

by me some 5 years back. :-)








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By Paresh Kale