दररोज आम्हाला बेसुमार पिळलं जातं
आम्हाला वाईट वाटेल म्हणुन कि काय,
उदया परत वापरण्यासाठी,
वाळत 'टाकलं ' जातं
रेशमी धोतराचा कधी फडका होत नाही ,
पण चांगल्या साडीचा होऊ शकतो,
जिथे भावनाच निर्माल्य होऊ शकतात,
तिथे गुलाब काय घाणेरी सारखंच .
भावनांचा फुलोरा शब्दांचा धुमारा, काळाच्या गर्दीत मनाचा पसारा. जपताना त्या आठवणी, चार ओळी तुझ्यासाठी !
अचानक से याद आया
तो गंजीखाने मे पडी संदुक को खोला
और उसके तले मे मिले
कुछ लम्हे मलमल के कपड़े में लपेटे हुए
केवड़े की खुशबू ने
उन्हें कई साल बेहोश कर रखा था
अब मैं आ गया हूं
वरना इन्हें बस यादों का सहारा था
देखते मुझे लिपट लिए
रोने लगे बच्चे की तरह
जैसे अभी जन्मे हो
और माँ से लिपट गए हो
आज भी उतनेही गुलाबी है
जितने कभी एक जमाने में होते थे
बस बढ़ गयी थी झुर्रिया
जो और उभर रही थी मुस्कुराने से
संदूक में और भी कुछ दिखा
समेटने उन्हें मेरे हाथ अपने आप बढ़े
लेकिन वो शर्माए यादोँसे ज्यादा
समझ गया ये वही थे आधे अधूरे वादे
वादे जो तुमने मुझसे
और मैंने मुझसे किए थे
राह अंततक साथ चलने के
ये आखिर से उस आखिर तक
घबराए सहमेसे कोने में जा बैठे
शायद नाराज थे अपने आप से
कुछ पूरे नही होते तो कुछ
पूरे नही कर सकते, समझाया उन्हें
कुछ छोडना मुनासिब है
आगे बढ़ने के लिये
तो कई को निभाना
जरूरी है जीने के लिये
जो पिछे रह जाते है
वो बुरे नही होते
वापस मिलही जाते है
चाहे हो लम्हे, यादे, या फिर वादे !
दिवस सरला झाली रात्र
अनंत फिरते हे कालचक्र
अंधाराच्या कुशीत उगवे
हळूच प्रणय राज sudhakar
वसंत जाऊनी ग्रीष्म आला
सोनफुलांनी बहावा सजला
हरेक झुबका उधळे रंग पिवळा
पर्णहीन वृक्षाने हरवला हिरवा
भेट प्रिये त्या झाडाखाली
पुष्पवर्षाव वाट पाहे तुझी
बैस शेजारी कुसुम शय्येवरी
दोघ करू गुजगोष्टी रात्र सारी
मंद हवा स्पर्शानी भारावली
जादू तुझी की या चांदण्याची
वाटे संपूच नये हा बहर कधी
थांबेल का ही वेळ थोडीतरी
तू जाशील निघुन भल्यापहाटे
भेट आजची, झाले स्वप्न खरे
ऋतू मिलनाचा समीप आहे
अशी चोरून भेट शेवटची बरे !
मेरे दिलकी दुआ आज कौनसा रंग लायी है
दहलीज पार कर आज गझल घर आयी है |शमा बुझाओ, उसे जलने की जरुरत नहीं है
रोशनीसे महकाने, आज नजम घर आयी है |
अनगिनत तसव्वुर ख़यालोमे बेझिझक है
तू सामने है, तो दिमागने सोच क्यों खोयी है?
कुछ बाते करू या बस ये नूर देखता रहु मैं
तेरे लबोने इन लब्जोंको ख़ामोशी सिखायी है |
निगाह मिलाना चाहता हु, आँखे क्यों झुकी है
चाँद ढकने कम्बख्त, अकेली झुल्फ आयी है !
रफ़्तार बहके इसकी, समय बड़ा बेईमान है
ठहर थोड़ा, इश्क़के इम्तिहांकी घड़ी आयी है |
अपने दरमियाँ के ये फासले ख़त्म क्यों नहीं होते
मजबूर हालात तोड़ने ये मुनासिब घडी आयी है |
बहकने दे 'अकाब' मुझे रोकना नामुमकिन है
इन सवालोंसे, जवाब माँगने की बारी आयी है |
रात बरसात की थी, और आँखे कुछ नम
भीगा चिराग जलने में, वक्त तो लगता है
उनको अपना बनाना, बात ये मुश्किल है
इक पत्थर घर बनने में, वक्त तो लगता है
बात जिनके दिल छू जाती, वही अपने है
आँख से आँसू बहने में, वक्त तो लगता है
लाख सौदे रोज होते है, इस दुनिया मे
सच्चा प्यार समझने में, वक़्त तो लगता है
इनकार का गम नही, तेरी मजबूरी का है
बेबस हालात समझने मे, वक्त तो लगता है
इस भीड़ में तनहा 'अकाब ' है तेरे बिना
खोने का डर मिटने मे, वक्त तो लगता है
वक्त का मिला है तोहफा
वक्तसे न लूट पायेगा
कागज पे नाम जो लिखा
वक्तसे न मिट पायेगा
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एक सवाल है छोटासा
जवाब क्या आएगा ?
सवाल तो तुम हो
सही जवाब ही आएगा