मिलीभगत



हर रोज सुबह

मुझे बिना पुछे

वो सुरज की किरने

तुम्हे कैसे लिपट जाती है?

और गौरतलब है

तुम क्या खिल जाती हो।


कुछ उसी तरह

नहाने के बाद

वो पानी की बुंदे

तुम्हे नही छोडती

खैर कोई बात नही

गिले बाल मेरी कमजोरी है।


हवाओंको तो बस

चाहीये होता है बहाना

तुम्हारे साथ रहे

और करे मस्तीया

शायद वही तुम्हारी

हसी खिलाई रहती है 


तुम्हे बिलकुल पता नही

रात की चादर ओढे 

जब सो जाती हो

उस मासुम चेहरेके

भाव निहारने के लिये

मै रातभर जागता हू ।


और पता नही

इस सृष्टीके कितने

अनजान अनगिनत

तत्व तुम्हे आजभी

तराशे जा रहे है

शायद तुमसे अभी तक

खुदाका मन भरा नही।



और कुछ?

ऊन जखमोंको भरने केलीये

तुम्हारा एक आसू काफी है

पर हमने तो तुम्हे रोते देखा नही

क्या अबभी कूछ सितम बाकी है?


इस इंतजार के आईनेमे

तुम्हारा एक दीदार काफी है

पर हमतो बस राह देखते रह गये

क्या आज रात अमावसकी है?


इस रुखी रुखी जिंदगी मे

आप हमे याद करना ही काफी है

पर हम करते है  इश्क बेइतहा तुमसे

क्या धडकने किसीं के लिये रूकी है?



शब्दकथा

 

शब्द येऊन सांगतात आत्मकथा 

माझे काम फक्त लिहिण्या पुरते 

सत्य - कलेचा संबंध योगायोगाचा 

मी जाणतो हे वाक्य बोलण्यापुरते 


होतात रिते वाहावून भावना 

कळत नाही कधी हि रात्र सरते 

म्हणतात नवी पहाट नवी आशा 

मी जाणतो हे नाटक दिवसापुरते 


एखाद दिवशी होतात अबोल 

अश्रुंशिवाय काही न स्फुटते 

काय म्हणावे मला कळत नाही 

मी जाणतो हे भाव शब्दांपलीकडले


येता उबग यमक जोडण्याचा

भाषा मग मरणाची चालते 

वेळ येते तुझ्या निरोपाची

मी जाणतो हे विचार बरे नव्हे




फरमाइश


अँधेरे में एक हसीं रात के साथ अल्फाज इश्क़ फर्मा रहे हो, 

और आपकी अज़ीज़ आपसे  कहे , 

"कुछ सुनाईये न !"

तब वो फरमाइश 

ठुकराई नहीं जा सकती !


फरमाइश (Request)


लब्जोंको जोडके नशीले ख़ाब बुनलु 

कोई गझल मैं लिख दू, फरमाइश तो कीजिये  


होठोंका काम कुछ और है, बात रोके नहीं 

करदु हर आरजू  पुरी, फरमाइश तो कीजिये  (wish)


हर सहर, ओस के कतरोंको समेटलू  (Morning, Dew drops)

तेरे आँचल मोती भरु, फरमाइश तो कीजिये  


चौदहवीके चांदसे लोग करते है तेरी बराबरी 

चाँदको फना करदु,  फरमाइश तो कीजिये  (destroy)


ऐ  साकी, अब शराब का नशा चढ़ता नहीं  (a loved lady)

तेरे आंखोके जाम पीलू, फरमाइश तो कीजिये  


हर रोज जान लेती हो मेरी थोड़ी थोड़ी 

तेरे जानोमे दम तोडदु , फरमाइश तो कीजिये   (Lap )




सहजच

सहजच


कधीतरी माझीही काळजी करशील?
गरज नाही तरीही.


अशीच का होईना, बघून हसशील?
थोडीच का होईना, नजर जोडशील?
उगीच का होईना, जराशी चीडशील ?
काळजी घे थोडीशी, सहज रागावशील?
तशी गरज नाही तरीही. 


काल चांदण्यात फिरताना आठवलीस,
तशी गरज नाही तरीही.


जाऊ दूरवर कुठेतरी, फिरायला येशील?
मागितला नाही कधी, आज हात देशील?
अमुल्य आहे, मलाही  थोडा वेळ देशील?
गूढ तारकांसाठी, एखादा क्षण घालवशील?
तशी गरज नाही तरीही.…।

 

मेरे ख़यालोंकी मलिका ....

 

मेरे ख़यालोंकी मलिका ....


कभी एक गजराभी पहन लेना 

उड़ती झुल्फोंको कोई तो साथ देगा 


और न भूलना वो हल्कीसी बिंदी 

जो खिला देगी खूबसूरत चेहरा 


हथेली भरीहो हिनाकि खुशबुसे 

कोमल हातोंका जादू और चलेगा


चुडियोंका जरूरी है खनकना

आवाज़ में उनकी हँसी मिला देना


हो सके तो पायल भी चढ़ा देना 

आहट उनकी आमद-ए -गुल होगा (Blooming of flowers)


कानोमे सजादेना तुम हुस्न के झुमके 

गाल शरमा जाए ऐसे सवर जाना


दूसरी कायनात न सोचु मै  कभी  (World)

निकलना पहनकर लिबास कुछ ऐसा 


ये सादगी फिर क़यामत ही लाएगी 

अब और ये दिल कितना मर मिटेगा ?



इंतज़ार करूँगा

 

तुमने रोक रखे  है  जो

अरसो से आसू  मेरे लिए 

बहने का इंतज़ार करूँगा 


कभी खुदाभी न चाहे

उदास नही  होगी, आपके 

तफरीह का इंतज़ार करूँगा  (content)


वादेके बावज़ूद  जो 

कभी नहीं मिलेगा मुझे 

उस खत का इंतज़ार करूँगा 


चाहकर भी न भर पायी 

और हम तरसते रहे 

वो  हामी का इंतज़ार करूँगा  


चला हु दस कदम मैं तो 

तय  कुछ दुरी अब आपसे  

करने  का इंतज़ार करूँगा  


नामुमकिन है, ये यकि है 

उम्मीदे जवाँ  फिर भी है 

अजुबे का इंतज़ार करूँगा  


                              



निशान

 

निशान

अरसो बाद लौटा शहरमे
पता चला आजभी,
पुछनेपे कोईभी पता या रास्ता
निशानात उसीकी हवेली है ।




आनंद सोहळा

आनंद सोहळा 


View from our lab at NIT Rourkela on a rainy day

कातरवेळी आकाशाने 

केले ढीगभर ढग गोळा 

रचून ठेवले एकावर एक

केला आसमंत काळोखा 


अरे वर्षा राणी येतेय !

गडगडाटाने केला पुकारा  

पटदिशी  तयार व्हा 

होणारे एक सोहळा साजरा !


वारा झाला वेडापिसा ,

कुठं जाऊ त्याला कळेना ,

सैरावरा  घुटमळला ,

उठवत  साऱ्या झाडांना !


अत्यानंदुन धरा म्हणाली ,

तुम्ही माझी कमाल बघा !

भेटेल वर्षा तेव्हा करीन , 

मृदगंधाचा शिडकावा !


वीज म्हटली, बरं  झालं बाई !

वर्दी मिळाली वेळेत

लेऊन माझी चंदेरी साडी ,

तिच्या स्वागताला  मी नाचेन 

 

वर्षाराणी येताच पानांचे 

सुरु झाले समूह गान 

साऱ्या सृष्टींने धरला ठेका 

गेला हरेक विसरून भान 


बघत होतो मी गंमत 

राहून उभा कोपरयात 

बरं झालं चूक कळली 

खरी मजा चिंब भिजण्यात 






खामोशी


खामोशी 


खामोशी कितनी अजीब है !

खामोश होते हुए भी ,

बहुत कुछ कहती है ,

और फिर भी ,

कुछ नहीं कह पाती। 


और देखो उस आहट को ,

छोटीसी जान ,

मगर एक हल्कीसी आहट ,

भावनाओंसे भरी ,

कई किताबें लिख देती है !


और उस आहट के बाद ,

खामोशिसे भरे अनगिनत पल ,

सबूत होते है ,

उन तमाम जज्बातोंके  ,

जो कभी जन्मे ही नहीं। 


फिर शुरू होता  है ,

क़यासोंका ' सिलसिला ',

अगर ऐसा होता ,

तो कैसा होता ?

तुम ये कहती !

तुम वो कहती !

तुम इस बात पे हैरान  होती !

तुम उस  बात पे कितनी हसती !

...... 

..... 

..... 

...... 

मै और मेरी तन्हाई अक्सर ये बाते करते है !


( आखिरी लाइने जावेद अख्तर साहब के वही मशहूर गाने से ली है, उनकी क्षमा मांगकर | मकसद कविता को एक रोमांचक मोड़ पे ख़तम करना था | )