मरासिम

उन खुदसर यादोंको जाने क्यों मनाता हूं

कुछ देर छुप जाए कही हररोज मनाता हूं


कमीयों के बावजूद तुझे उतनाही चाहता हूं

ख़यालोमे तेरे होनेका जश्न हररोज मनाता हूं


गुलपोशी में गुमी तेरी मसर्रत ढूंढता हु

अज़ली रातकी सुबह हररोज मनाता हु


परेशान मरासिम को क्या नाम दु सोचता हूं

गुजरे रिश्ते का अहसास हररोज मनाता हु




आरजू

समंदर के रेतसे साहिल पे, घर बनाने की आरजू थी

बहकी बहकी लहरोंसे, मुझे दिल्लगी की आरजू थी |


बहता गया इस जिंदगी के साथ, या फिर बहाया गया

तुझसे मुलाकात के बाद, मुझे किनारे की आरजू थी |


बुझा न दे कही ये हवाएं, काँपती लौ को छुपा दिया

जला क्यों हाथ मेरा, मुझे कसूर जानने की आरजू थी |


मीर का मुद्दा इंतकाम था, कहे कोई तुम्हे तुमसा मिले

'अकाब' चाहे परवाह, मुझे उससे मिलने की आरजू थी |




आस

झूठा ही सही एक बार मुझे मर के देखना था

जनाज़े में कौन होता है शामिल ये देखना था


हरदम जो जताते थे है दिल बडा दरिया हमारा

क्या ऑंखसे उनके समंदर बहेगा ये देखना था


ताउम्र बोझ उठाये कइयोंका, कंधा कौन देगा

कौन दोस्त और कौन दुश्मन, बस ये देखना था


हमेभी आपसे मुहोब्बत है वो बोल न सके कभी

आज उनके चेहरेपे इजहार ए इश्क़ देखना था


पता नही जीतेजी हमे क्यों याद करता था कोई

किसके दिलसे आज मेरा जनाजा उठा देखना था






अच्छी बात

मेरी तरफ देख तेरा मुस्कुराना अच्छी बात नहीं

मरे हुए नादानको और मारना अच्छी बात नहीं


हिसाब रखता हूं मैं तेरे साथ बिताए हर पलका 

वक्तकी तिश्नगीको प्यासा रखे अच्छी बात नहीं


दराज-तर सफर बहुत कठिन है मगर तेरे सिवा 

बिना कोशिश अलविदा कहना अच्छी बात नहीं


हूँ वाकिफ तेरे रूह के रग रग से ऐ मेरे हमनवा

पर मैं तुम्हें अबभी अनजान हु अच्छी बात नही



अरे वेड्या मना तळमळशी



अधिकार देणारा मी कोण?
देवाने सर्वांनाच मन दिलंय
प्रत्येक फुलाला सुगंध असतोच
ती जिवनाला आधार देतायत

तू बोलणार तरी किती?
शब्द नि:शब्द होईपर्यंतच ना!
प्रत्येक हसऱ्या मुकेपणा मागे
शेवटी एक गोड होकारच ना!

तू नाकारणार तरी काय?
आपलं प्रेम हे एकमेव सत्य आहे
हवं ते माग मी देईन ,
दु:ख कुठे सुखापासून वेगळं आहे?

काही छेडण्याची जरुरीच नाही,
हृदयाच्या तारानाच मी हात घातलाय
नाही म्हटलं तरी हा झंकार
तुझ्या रोमारोमात भरलाय

सुख दु:ख,
चंद्र तारे,
काही मनोरे,
काही कंगोरे,
काहीही आण
चालेल,
कारण ते मोठ्ठ स्वप्न,
फक्त दोघांच असेल.

सोचता हूँ

तेरे बारेमे मैं आजकल ज्यादाहि सोचता हूं
ख़्वाबभी बिन तेरे अधूरे है इतना सोचता हूं

फूल और भंवरा बाते जरूर करते होंगे
मिलके तुमसे क्या कहूँ अक्सर सोचता हूं

अगर कभी तुमसे नाराज हो भी जाऊं
यकीनन खामोशी चुप ना रहेगी सोचता हूं

तेरे मेरे आलम के बीच ये फलक है फैला
क्या रास आएंगे मरासिम इस जहां के सोचता हूं

'अकाब' उड़े पर के या जिद के भरोसे
जमीपर खड़ा मैं बेबस इंसान सोचता हूं



अर्सा

रात जाग रूमानी खत लिखे एक अर्सा हुआ
लफ़्जोंको कागज पे सजाके एक अर्सा हुआ

बाहों में घुलकर खामोश बैठा वक्त याद आया
तेरे चूड़ेमें सजे फ़ूल सुंगकर एक अर्सा हुआ

मर्मरी बदन और सुर्ख होठोंसे मैं बच तो पाया 
तेरे कातिल आँखोंके शिकार हुए एक अर्सा हुआ

हर मोडपे समय जरूरते बदलता चला गया
जिंदगी तूने मेरा नाम पुकारे एक अर्सा हुआ

वक्तका हिसाब हमे कभी समझ में न आया
लहरोने पैरों तले रेत बहाये एक अर्सा हुआ

दर्दके बोझ तले हर कदम जैसे आखरी था
'अकाब'ने ऊंची उड़ान भरे एक अर्सा हुआ

                                                   

आगोश

कभी तो बरसो बारिश की बुंदो की तरह
घुलजाओ रूहमे अनकही आरजू की तरह

करीब होते हुए भी फासले कितने मजबूर
मिलो राह पे चाहे एक अजनबी की तरह

मेरे वजूद की सबब अब बन गए हो तुम
आग़ोशमे आ साहिल और लहरो की तरह 

                                              

मागणे

मागणे

असे अचानक विचारलेस काय?
मला सोडून जाशील का कधी?
आणलेस डोळ्यांत पाणी, सांग मला
डाव असा सोडतात का अधी मधी

अपेक्षित नाही तुझाकडून काही
मात्र एकटेपणात साथ हवी
आज मी थोडा व्यथित आहे,
उद्या देईन, जे मागशील काहि.

थोडा धीर धर, जातील हे दिवस
काळ सुद्धा थांबेल क्षणभर
जगाच्या गर्दीत हरवलेल्या शांततेत,
तु असशील माझी, अन तुझा मी.


फासले

आप दूर क्या गए लफ्जो के साथ फासले हुए

तेरी याद आती रही फिर खुदसे ही फासले हुए


याद सदा आती है तुम्हेभी, हिचकिया हमे ये बताये

दिल अब भी है जुड़े पर बदन के बीच फासले हुए